Wednesday, 23 May 2012

गौरवशाली इतिहास का साक्षी, कहीं इतिहास न बन जाए

मैं गौरवशाली इतिहास का साक्षी, आजादी के आंदोलन के गवाह के रूप में कभी बिनोवा भावे, धीरेंद्र मजुमदार व जय प्रकाश नारायण सरीखे नेताओं का विश्राम स्थली आज जर्जर अवस्था पर रोने को विवश हूं। कभी मेरे बदन से फूलों की खुशबू उठती थी आज बदन से कांटे व झाड़ की टीस उठती है। लोगों में मेरी प्रतिष्ठा थी तथा गांव की हर नई-नवेली दुल्हन मेरे पास रूक आर्शीवाद लेकर ही अपने ससुराल में कदम रखती थी। जिसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. चंद्रशेखर सिंह की धर्म पत्‍‌नी भी शामिल थी। लेकिन मेरे आंगन में सांप-बिच्छूओं का डेरा है तो राहगीरों को सिर छुपाने के लिए उचित स्थान नहीं। यह क्रंदन है प्रखंड के मलयपुर स्थित जिला परिषद डाक बंगले का। जानकार बताते हैं कि एक समय यह डाक बंगला अपनी खुबसूरती के लिए प्रसिद्ध था। इसके बगान से उठते फूलों की खुशबू मंत्रमुग्ध कर देती थी। सभी सुविधाओं से परिपूर्ण था डाक बंगला। लेकिन वर्तमान समय में उपेक्षा का शिकार होकर खंडहर में तब्दील हो गया है। इस ऐतिहासिक डाक बंगले के जर्जर होने में कई कड़ी हैं। सर्वप्रथम इस डाक बंगले को पीएचईडी विभाग ने जिप से किराये पर लिया तथा जगह-जगह पर गड्ढा बना कर कोलतार संगृहित किया। उसके बाद बीएमपी ने इसे आशियाना बनाया लेकिन अब यह किसी का आशियाना तो दूर ठहराव के लायक भी नहीं रहा है। इसकी चाहरदीवारी गिर गई है। भवन के ऊपर पेड़ निकल आए । बरसात के दिनों में भवन बुरी तरह चूता है। इतना जर्जर होने के बावजूद आज भी इसमें आकर्षण की चमक बरकरार है। शायद इसका कारण महान विभूतियों के चरण धूल हो। अगर वक्त रहते संभल गया तो इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाया जा सकता है वरना यह खुद इतिहास के पन्ने में दर्ज हो गुमनामी के अंधेरे में खो जाएगा। जिप अध्यक्ष ब्रह्मादेव रावत कहते हैं कि इस डाक बंगले का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इसके आगे की खाली जमीन में दुकान बनाया जाएगा ताकि राजस्व की प्राप्ति हो सके। इसके लिए योजना तैयार कर ली गई है।

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